Editorial :- लालू जेल में सोनिया-राहुल बेल पर  जेल से चलायेंगे पार्टी ?

4 December 2019

राहुुल गाध्ंाी और सोनिया गांधी अभी बेल पर हैं। कांग्रेस के अन्य नेता चाहे वे शशि थरूर हों या शिव कुमार वे भी बेल पर हैं।

राहुल गांधी के स्तीफे के बाद दो महीने से भी अधिक समय तक कांग्रेस नेता अपनी पार्टी अध्यक्ष नहीं चुन सके थे। चिदंबरम ने उस समय कहा था कि सोनिया गांधी को चाहिये कि वह कांग्रेस पार्टी की कमान हाथ में लें। उनके इस अनुरोध के बाद अब कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गंाधी हैं।

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद लालू यादव के सुपुत्र तेजप्रताप और तेजस्वी तथा सुपुत्री मीसा भारती प्राय: गायब सी हो गई थी।  अब आज का समाचार है कि   एक बार फिर से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं।

इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि सोनिया गांधी जी के पदचिन्हों पर लालू यादव चले हैं। 

अब क्या सोनिया गांधी और राहुल गांधी बेल पर हैं। तो क्या वे लालू यादव के पदचिन्हों पर चलते हुए जेल जाने की संभावना देख रहे हैं?

ऐसी स्थिति में वे भी संभव है लालू यादव जैसे ही जेल से अपनी पार्टी चलायेंगे।

दिसंबर २०१७ में लालू यादव जेल में ही कर रहे थे गीता-पाठ और पूजा-पाठ।  अब जून २२, २०१९ को लालू यादव के बड़े पुत्र तेज प्रताप ने उन्हें पुन: भगवत गीता भेंट की है।

अब प्रश्न यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी के जैसे ही शिवसेना के उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के वर्तमन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी सेक्युलर हो गये हैं।

ऐसी स्थिति में वे सोनिया गांधी जी को अभी १० जनपथ में और भविष्य में लालू जैसीे ही स्थिति प्राप्त करने पर जेल में गीता भेंट करेंगे या बाईबिल या कुरान या तीनों।

जिस प्रकार से महाराष्ट्र विधानसभा में शपथ लेते समय कांग्रेस के नेताओं ने मंत्रीपद की शपथ लेते समय संविधान से पहले पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी के नाम की शपथ ली थी  वैसे ही अब उनका अनुकरण कर क्या आरजेडी के नेता जेल में जाकर लालू यादव के नाम की  शपथ लेकर पार्टी में कोई दायित्व स्वीकार करेंगे?

अभी संविधान दिवस के अवसर पर संसद में आयोजित कार्यक्रमों में भाग न लेते हुए कांग्रेस ने संसद का बहिस्कार किया था। इसी प्रकार से यूपीए शासनकाल मेें उस समय के मंत्री  अर्जुन सिंह के द्वारा वंदेमातरम शताब्दि समारोह का जो आयोजन शासकीय स्तर पर हुआ था उसका भी बहिस्कार सोनिया गांधी और उस समय के पीएम मनमोहन सिंह ने किया था।

इससे यह जाहिर होता है कि वंदे मातरम और संविधान से बढ़कर कांग्रेस के लिये गांधी परिवार है।

यह भी जनतंत्र का एक मजाक है कि वर्तमान में भाजपा और वामपंथी पार्टियों को छोड़कर प्राय: सभी पार्टियां वंशवादी डायनेस्टिक पार्टियां है।

क्या यह स्थिति प्रजातंत्र को मजबूती प्रदान करेगी?

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