Editorial :- जिन्ना वाली आजादी के निहितार्थ : शाहीन बाग में थरूर व अय्यर

16 January 2020

आज जिस प्रकार की परिस्थितियां सीएए, एनपीआर, एनआरसी आदि की आड़ में जेएनयू जामिया शिक्षा संस्थानों में हिंसा भड़काकर ये अलगाववादी ताकतें अपने चरित्र का चित्रण कर रहे हैं शाहीन बाग में । वहॉ जाकर शशि थरूर ने यह बता दिया था कि  कांग्रेस इन अलगाववादी ताकतों के साथ है। इसके बाद कल वहॉ मणिशंकर अय्यर पहुंच कर पीएम मोदी को कातिल तक कह डाला था। यह सब उन्होंने लाहौर में पाकिस्तान की इमरान सरकार से गुफ्तगू करने के उपरांत किया है। स्पष्ट है इन सबके पीछे पाकिस्तान और कांगे्रस का हाथ है।

>>> अभी जो स्थिति हमें दिख रही है वहीं स्थिति १९४७ के पूर्व भी भारत में थी।

सत्तालोलुप जिन्ना और पंडित नेहरू ने धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन स्वीकार किया  और  अपने-अपने देश के राष्ट्रध्यक्ष प्रधानमंत्री बन गये।

>> मुस्लिम राजनीति में सर सैयद की परंपरा मुस्लिम लीग (1906 में स्थापित) के रूप में उभरी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में स्थापित) के विरूध्द उनका प्रोपेगंडा था कि कांग्रेस हिन्दुओं की पार्टी है और प्रोपेगंडा आज़ाद-पूर्व भारत के मुस्लिमों में व्याप्त रहा।

कुछ अपवादों को छोड़कर वे कांग्रेस से दूर रहे और यहाँ तक कि वे आज़ादी की लड़ाई से भी भाग नहीं लिया। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ब्रिटिश-भारत के मुस्लिम बहुल राज्यों मसलन-बंगाल, पंजाब में लगभग सभी स्वतंत्रता सेनानी हिन्दू या सिख थे।

टू नेशन थ्योरी के प्रवर्तक सर सईद अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के भी संस्थापक थे।

* सर सैयद ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में बनाई गई) का विरोध इस आधार पर किया कि यह एक हिंदू-बहुसंख्यक संगठन था, मुसलमानों को इससे दूर रहने का आह्वान करता था।

21.0 21.1 21.2 मजूमदार, 1969।

* कुल मिलाकर सर सैयद को दो राष्ट्र सिद्धांत के पिता और पाकिस्तान के संस्थापक पिता में से एक माना जाता है, साथ ही अल्लामा इकबाल और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ।

 अकरम [/ इकराम / इकराम], शेख मुहम्मद। मौज-ए-कौसर (उर्दू में)। लाहौर। पीपी। 86, 85।

* मुस्लिम आत्म-जागरण और पहचान के लिए आंदोलन की शुरुआत मुस्लिम आधुनिकतावादी और सुधारक सैयद अहमद खान (1817-1818) ने की थी। कई पाकिस्तानियों ने उन्हें दो-राष्ट्र सिद्धांत के वास्तुकार के रूप में वर्णित किया है।

>> ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में जब आई तब भारत में अनेक छोटे-बड़े रजवाड़े थे। इन रजवाड़ों को आपस में लड़ाकर उलझाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना कर दी थी।

आज भी छोटे-बड़े अनेक परिवारवादी राजनीतिक पार्टियां भारत में प्रजातंत्र की छत्रछाया में उछल कूद कर रही हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग को आगे रखकर विभिन्न परिवारवादी पार्टियों को आपस में उलझाकर लड़ाकर कांग्रेस पार्टी अपना उल्लू सीधा करना चाहती है।

>> अब आज के वातावरण से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिस प्रकार से १९४७ के पूर्व   कांग्रेस पार्टी को हिन्दू पार्टी सर सईद जिन्ना आदि प्रचारित किया करते थे उसी प्रकार से अब भारतीय जनता पार्टी को हिन्दुओं की पार्टी प्रचारित किया जा रहा है।

आज का समाचार है : केरल की एक चर्च ने दावा किया है कि ईसाई महिलाओं को लव जिहाद के जरिए आतंकवादी गतिविधियों में धकेला जा रहा है >> माता-पिता से बच्चों को बचाने की अपील ।

 1918 में जिन्ना ने पारसी धर्म की लड़की से दूसरी शादी की। उनके इस अन्तर्धार्मिक विवाह का पारसी और कट्टरपन्थी मुस्लिम समाज में व्यापक विरोध हुआ। अन्त में उनकी पत्नी रत्तीबाई ने इस्लाम कबूल कर लिया। 1919 में उन्होंने अपनी एक मात्र सन्तान डीना को जन्म दिया।

सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा लिखने वाले मो. इकबाल भी कश्मीरी पंडित थे। बाद वे मुस्लिम बन गये।

>> जिन्ना वाली आजादी के नारे शाहीन बाग में लगाये गये थे उसका निहतार्थ भी ऊपर दर्शाये तथ्यों में निहित है।

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