Editorial :- कांग्रेस और… जेएनयू व जामिया तथा अलीगढ़ युनिवर्सिटी को न बनने दें देश विरोधी कृत्यों का अड्डा

17 February 2020

महात्मा गांधी की अंतिम इच्छा थी कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी को भंग कर देना चाहिये जिससे की कांग्रेस पार्टी का दुरपयोग भविष्य में राजनीतिक फायदे के लिये सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ न कर सकें।

हम यह देख रहे हैं कि महात्मा गांधी की भविष्य वाणी ठीक ही थी। पंडित नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक सत्ता हथियाने के लिये अनेक प्रकार के हथकंडे अपनाये और अपना रहे हैंं। सत्ता के लालच में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा की पूर्ति के लिये महात्मा गांधी की पीठ में छुरा घोंपकर पंडित नेहरू ने हाथ मिलाकर जिन्ना से देश का बंटवारा धार्मिक आधार पर करवाया।

अब प्रधानमंत्री बनने की लालसा में पाकिस्तान और चाईना से हाथ मिलाकर राहुल गांधी जाने-अंजाने में टुकड़े-टुकड़े गैंग के जिन्ना वाली आजादी के नारे लगाने वालों के मुखिया बन गये हैं।

इस भारत को विभाजित करने वाली वर्तमान प्रवृत्ति के केन्द्र स्थल बन गये हैं जेएनयू व जामिया तथा अलीगढ़ युनिवर्सिटी।

10 छ्वड्डठ्ठ 2020 – वरिष्ठ बीजेपी नेता तथा राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक बार फिर नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को बंद करने का सुझाव दिया था।

सीएए के विरोध के नाम पर जिस प्रकार से जेएनयू अलीगढ़ व जामिया युनिवर्सिटी में हिंसक प्रदर्शन हुए और इसका विस्तार शाहीनबाग तक हुआ। इन सबका संचालन बैकडोर से पीएफआई को आगे कर कांग्रेस और ्र्रक्क पार्टी ने किया यह आरोप लग चुका है। इसके कुछ तथ्य मीडिया में आ चुके हैं।

जेएनयू, जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी की स्थापना १९६९ में इंदिरा गांधी के शासनकाल में हुई थी। मीडिया में यह विस्तार से चर्चा हो चुकी है कि सोवियत संघ ही केजीबी के माध्यम से इंदिरा गांधी शासन का संचालन कर रहा था। जिस प्रकार से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे परंतु बैकडोर से सोनिया गांधी ही यूपीए सरकार का संचालन करती रही वही स्थिति उस समय केजीबी और इंदिरा सरकार की थी। वर्तमान में सोवियत रूस के राष्ट्रपति पुतिन उस समय भारत में केजीबी के प्रमुख थे।

राजीव गांधी के बॉडीगार्ड यानी सुरक्षातंत्र को भी सोवियत संघ में ही प्रशिक्षित किया गया था। सोनिया गांधी के पीछे भी केजीबी सहायक रही है। इन सब बातों की विस्तार से चर्चा मैं अपनी पुस्तक स्द्बद्यद्गठ्ठह्ल ्रह्यह्यड्डह्यह्यद्बठ्ठह्य छ्वड्डठ्ठ११,१९६६ ड्ढशशद्म द्यद्बठ्ठद्म – ड्ढशशद्मह्य.द्दशशद्दद्यद्ग.ष्श.द्बठ्ठ/ड्ढशशद्मह्य?द्बह्यड्ढठ्ठ=९३५०८७८४५३ में कर चुका हूं।

जेएनयू की स्थापना के पीछे भी सोवियत संघ और केजीबी का हाथ रहा है। यही कारण है कि जेएनयू की स्थापना काल से उसमें वामपंथी तत्वों का प्रभुत्व रहा है।

जेएनयू में जो आजादी के नारे लगे थे और जिसका समर्थन करने के लिये राहुल गांधी और केजरीवाल वामपंथी नेताओं के साथ गये थे तब से लेकर सीएए के नाम पर जो विरोध का फैलाव जेएनयू से लेकर जामिया, अलीगढ़ युनिवर्सिटी और शाहीनबाग तक हुआ उसे इसी परिप्रेश्य में देखा जाना चाहिये।

सीएए का विरोध करना प्रजातांत्रिक अधिकार हो सकता है। सीएए के प्रति असहमति प्रकट करने का प्रजातांत्रित अधिकार सभी को है परंतु वह हिंसात्मक न हो। हिंसा भी बर्दाश्त की जा सकती है परंतु सीएए के विरोध के नाम पर शरजील इमाम जैसे जेएनयू के छात्र अलीगढ़ युनिवर्सिटी और जेएनयू में तथा शाहीनबाग में एक आर्गनाईजर के रूप में भारत को इस्लामिक देश बनाने का आव्हान करे चिकनगलियारे को काटकर असम तथा अन्य उत्तरपूर्वी प्रांतों को भारत से अलग करने का आव्हान करें इसे तो असहमति नहीं समझा जा सकता । यह तो देश विरोधी हरकत ही कही जायेगी।

इस प्रकार की देशविरोधी हरकतों को विश्व को कोई भी देश बर्दाश्त नहीं करेगा। इसलिये देश कोविभाजित करने की, जिन्ना वाली आजादी चाहिय के नारे लगाने वालों को असहमति न समझा जाये यह तो एक प्रकार से देशद्रोह है।

और यही कारण है कि शरजील इमाम और इसके पहले कन्हैय्या कुमार, उमर खालिद तथा हार्दिक पटेल पर देशद्रोह के मुकदमें कायम हो चुके हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि दिल्ली के बाद पूरे भारत पर शासन करने का मुंगेरीलाल का हसीन सपना देखने वाले केजरीवाल उक्त देशद्रोह के मुकदमें को कोर्ट में ले जाने के लिये पुलिस को अनुमति तक नहीं दे रहे हैं।

इसलिये हमारा मानना यह है कि जेएनयू, जामिया और अलीगढ़ युनिवर्सिटी को कुछ समय के लिये बंद कर इन संस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन किया जाये और भविष्य में देशविरोधी हरकतें वहॉ पर न हों इस प्रकार की व्यवस्था का निर्माण हो।

प्रियंका वाड्रा ने अभी जो तथाकथित वीडियो प्रसारित या शेयर किया है उस साजिश का पर्दाफाश करते हुए एक अन्य वीडियो भी कुछ घंटे बाद वायरल हो चुका है।

अब यह भारत की १३० करोड़ जनता को सोचना है कि देश मेें आग कौन पार्टी और किस प्रकार के नेता लगा रहे हैं । इस आग को कोई एक पार्टी या एक नेता नहीं बल्कि भारत की १३० करोड़ जनता को मिलकर बुझाना हेागा और भारत की एकता को कायम रखना होगा।

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