Editorial :- भारत को बदनाम करने वाली विदेश ताकतों का सहायक न बने विपक्ष

8 May 2020

भारत को बदनाम करने के लिये देश के साथ-साथ विदेशी ताकतें भी लगातार कोशिश में जुटी हैं।

क्रिस्चियन यूरोपीय देश और मुस्लिम देश भारत को बदनाम करने की साजिश करते रही हैं।

इस्लामिक देश की कुछ ताकतें भी पहले भारत का विरोध करते रही हैं परंतु अब पीएम मोदी के सबका साथ सबका विश्वास की नीति के कारण पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया को छोड़कर बाकी सभी मुस्लिम देश भारत से प्रभावित हुए हैं। ३७० धारा निष्प्रभावी करने का भारत ने जो कदम उठाया उसका भी पाकिस्तान को छोड़कर किसी भी मुस्लिम देश ने विरोध नहीं किया था।

दुर्भाग्य की बात है कि यहॉ की कांग्रेस तथा कुछ अन्य विपक्षी पार्टियां पाकिस्तान परस्त नीति अपना रहीं हैं।

तथाकथित सेक्युलर और खान गैंग में अब संयुक्त अरब अमीरात की महिला, प्रिंसेस हेंड अल कासिम भी शामिल हो गई हैं। कासिम लगातार भारत के विरूद्ध जहर उगल रही हैं और ट्वीट और इंटरव्यू के जरिए भारत की धर्म निरपेक्षता पर सवाल उठाकर बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं। राहुल गांधी की भी फोटो उनके साथ शेयर करती हुई प्रकाशित हो चुकी है। इसके पूर्व नवजोत सिंह सिद्धू भी उछल-उछल कर पाकिस्तान में इमरान खान और वहॉ के आर्मी चीफ बाजवा के साथ ही नहीं बल्कि वहॉ रह रहे खालिस्तानी गोपाल चावला के साथ भी फोटो शेयर करने में अपने आपको गौरवान्वित महसूस किये थे।

कश्मीर पर दुष्प्रचार करने वाले फोटोग्राफर्स को पुलित्जर अवार्ड मिला तो राहुल गांधी बोले हमें उन पर गर्व है।

 विदेशी मीडिया भी राईटर्स हो या पुलित्जर भारत को बदनाम करने की आदत सी बना ली है।

तथाकथित पत्रकारिता में सबसे बड़ा पुरस्कार देने वालों के रूप प्रसिद्ध पुलित्जर हो या फिर दुनिया की बड़ी समाचार एजेंसी रायटर हो, इन सब की भारत को बदनाम करने की आदत सी बन गई है। ये लोग हमेशा भारत को बदनाम करने का काम करते हैं। इन सब का यह दोगलापन आज का नहीं बल्कि पुराना है। स्वतंत्रता के पूर्व यानि 1947 से पहले की बात लें, तो जो इंग्लैंड लोकतंत्र की मूल भावना को कुचल कर भारत पर हिटलरशाही शासन थोप रखा था उसे यही लोग लोकतांत्रिक शासन कहते थे। आज भी ये लोग अपने दोगलेपन से बाज आने को तैयार नहीं हैं। जिस संगठन को उनकी आतंकी गतिविधियों के लिए पूरी दुनिया प्रतिबंधित कर रखा है और उसे आतंकी संगठन घोषित कर रखा है उसे ये लोग महज रिबेल ग्रुप बता रहें है। खास बात है कि इनके इस दोगलेपन को हमारे ही देश के प्रमुख विपक्षी दल के प्रमुख नेता और मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ लोग खाद-पानी दे रहे हैं।

 रॉयटर्स ने मृत हिज़बुल आतंकवादी को कहा “बागी कमांडर बनने वाला गणित अध्यापक” :

सर पर 12 लाख रुपये के ईनाम वाला नाइकू कश्मीर में सबसे लंबे समय जीवित रहने वाले आतंकवादियों में से एक है जिसने कई सैन्य अधिकारियों और नागरिकों को मारा था। कई स्थानीय पुलिसकर्मियों की हत्या का भी वह मास्टरमाइंड रहा था ताकि पुलिस को आतंक-विरोधी अभियानों में सम्मिलित होने से हतोत्साहित कर सके।

 जम्मू व कश्मीर पुलिस, भारतीय सेना और सीआरपीएफ के संयुक्त बड़े तलाशी अभियान ने खुफिया जानकारी मिलने के बाद पुलवामाम में नाइकू को मार गिराया था। सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने रॉयटर्स के इस कथन पर आक्रोश व्यक्त किया।

 एक उपयोगकर्ता ने लिखा, “हिज़बुल मुजाहिद्दीन ‘बागियोंÓ का समूह नहीं है। यूएस सरकार के अलावा यूरोपीय संघ और भारत द्वारा आधिकारिक रूप से यह आतंकवादी संगठन घोषित है।”

एक अन्य व्यक्ति ने लिखा, “यही कारण है कि भारत के लोग ‘पश्चिमीÓ मीडिया की विश्वसनीयता और पक्षपातपूर्ण रवैये पर प्रश्न उठाते हैं।” एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी की, “भारत माता के वीर सपूतों के साथ काम करने का गौरव प्राप्त करने के बाद आतंकवादियों पर मीडिया के एक वर्ग द्वारा रिपोर्टिंग को देखकर दुख होता है।”

 आतंकवादियों को ‘शहीदÓ होने की जगह ‘मारनेÓ जैसे शब्दों को इस्तेमाल करने को लेकर है। लेकिन द वायर जैसे मीडिया गिरोहों की कलम आज भी हिजबुल कमांडर रियाज नायकू को ‘आतंकवादीÓ कहने से कतराती है। आतंकवादी के स्थान पर द वायर ने रियाज़ नायकू के लिए रिपोर्ट के भीतर ‘ऑपरेशनल चीफ़’ शब्द का प्रयोग किया है।

द वायर की अजेंडायुक्त पत्रकारिता ने इस बार देश के लिए वीरगति को प्राप्त हुए सेना के जवानों के बलिदान का खुलेआम मखौल उड़ाया है। अपनी रिपोर्ट में द वायर ने हंदवाड़ा में सुरक्षाकर्मियों को मारने वाले आतंकियों को ‘कथित आतंकवादीÓ बताया है।