Editorial :- रूस के समर्थन के बावजूद  नेहरू की गलती के कारण भारत नहीं बन सकेगा हृस्ष्ट का स्थायी सदस्य?

24 June 2020

पिछले सप्ताह भारत यूएन में हृस्ष्ट का अस्थाई सदस्य बनने में सफल हो गया। स्थायी सदस्य भारत बने इसका विश्व के अधिकांश देश समर्थन किया हैं। विश्व की महान शक्तियां अमेरिका, फ्रांस और रूस भी भारत का समर्थन कर चुकी है । आज रूस ने पुन: अपना समर्थन भारत को दिया है। 

बावजूद इसके क्या नेहरू की गलती के कारण भारत हृस्ष्ट का स्थाई सदस्य बन सकेगा? 

१९५० में अमेरिका ने और १९५५ में रूस ने भारत के लिये नेहरू को यूएनएससी का स्थाई सदस्य बनने के प्रस्ताव दिये थे। परंतु नेहरू ने अमेरिका और रूस दोनों से प्राप्त हुए प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और भारत की जगह चीन को स्थाई सदस्य बनाने की सलाह अमेरिका और रूस को भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने दे दी थी।

अर्थात भारत के हाथ में अमेरिका और रूस के कारण जो वीटो पावर आने वाला था उस वीटो पावर को नेहरू ने कामरेड कृष्ण मेनन की सलाह पर चीन को सौंप दिया।

नेहरू की गलती के कारण अब यूएनएससी में चीन के हाथ में वीटो पावर है। इस वीटो पावर के कारण से जब भी भारत को यूएनएससी में स्थाई सदस्य बनाने का प्रस्ताव आयेगा तब चीन वीटो कर देगा। इसलिये नेहरू की गलती के कारण भारत का यूएनएससी की स्थायी सदस्यता प्राप्त करना बड़ा कठिन होगा।

भविष्य का क्या? 

>> संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिए चार्टर संशोधन की आवश्यकता होगी, जो चीनी वीटो के अधीन होगा। 

चीन एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत की उम्मीदवारी को अवरुद्ध करना जारी रख सकता है। स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव पर फाइल को राष्ट्रीय अभिलेखागार से पता लगाया जाना चाहिए, विघटित और स्थानांतरित किया जाना चाहिए। राष्ट्र को जानने का अधिकार है कि वास्तविकता क्या है? 

>> चीनी नेतृत्व ने ‘चाइना फस्र्टÓ की नीति का लगातार पालन किया। 1971 में संयुक्त राष्ट्र में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने ताइवान का स्थान लिया। उन्होंने 1971 के युद्ध में भू-राजनीतिक लाभ को बेअसर करने के लिए अगस्त 1972 में संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश के प्रवेश पर अपना पहला वीटो प्रयोग किया। मसूद अज़हर मामले में भी वीटो प्रयोग किया।

नेहरू ने भारत के लिये अमेरिका और रूस द्वारा  स्थायी सदस्य बनने के लिये जो प्रस्ताव आये थे वह  चीन से मधुर संबंध रखने के लिये उसे उन प्रस्तावों को चीन को समर्पित कर दिया। नेहरू ने शांति बनी रहे और चीन उसमें सहायक रहे इसलिये यह गलती की थी। 

नेहरू की चीन के साथ भारत के संबंधों में खलल न डालने की चिंता ने अगले दशक में संबंधों के बिगडऩे को नहीं रोका। यह अमेरिकी मशीनीकरण का परिणाम नहीं था, बल्कि चीनी आक्रामकता थी। भारत 50 के दशक से सोवियत वीटो पर निर्भर था। यह अजीब था कि हम सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में अपने लिए यह विकल्प नहीं रखना चाहते थे।

इसकी विस्तृत समीक्षा इस संपादकीय के नीचे अलग से की गई है।