Editorial :- टुकड़ें-टुकड़े गैंग का नारा अब हो – चीन तेरे होंगे टुकड़े चीन की बर्बादी तक संघर्ष रहेगा जारी

1 July 2020

जेएनयू में वामपंथी छात्र नेताओं कन्हैय्या और उमर खालिद आदि की उपस्थिति में आजादी के नारे लगे थे : कश्मीर मांगे आजादी, केरल मांगे आजादी, बस्तर मांगे आजादी : भारत की बर्बादी तक संघर्ष रहेगा जारी… इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह..

उक्त नारे जेएनयू में अफजल गुरू की शहीदी दिवस पर हुए आयोजन के दिन लगे थे। इसके दूसरे दिन राहुल गांधी,केजरीवाल, वामपंथी नेता डी राजा आदि उन छात्र नेताओं की पीठ थपथपाने के लिये पहुंचे थे।  

अब यह मांग भी उठ सकती है कि आजादी गैंग और उक्त नेताओं को अब चीन तेरे टुकड़े होंगे : चीन तेरी बर्बादी तक संघर्ष रहेगा जारी नारे लगाने और उन नारों का समर्थन करना चाहिये।

>> जेएनयू के बाद एक सोची-समझी साजिश के तहत 

ष्ट्र्र एएमयू में गूंजे कश्मीर, असम व केरल की आजादी के नारे, ्ररू छात्रों ने बनाई थी मानव शृंखला।

जादवपुर विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों के छात्रों द्वारा लगाए गए राष्ट्रविरोधी नारों के बाद आया है. इन छात्रों ने ‘कश्मीर मांगे आज़ादीÓ, ‘असम मांगे आज़ादीÓ जैसे के नारे लगाए. ये सभी आंदोलनकारी छात्र एक लंबा बैनर भी लेकर चल रहे थे, जिसमें लिखा था कि ‘हिन्दुराष्ट्र रेपिस्ट हैÓ.

जादवपुर विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं विक्टोरिया मेमोरियल के बाहर बीजेपी सांसद स्वपन दासगुप्ता और विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति बिद्युत चक्रवर्ती के खिलाफ एकत्र हुए थे. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के एक सर्वोच्च नेता ने भी झारखंड वि.स. चुनाव के समय कहा था कि भारत को दुनिया के रेप कैपिटल के रूप में जाना जाता है।

भारत अपनी नीति पर नए सिरे करे विचार

चीन की सबसे ज्यादा दुखने वाली रग है तिब्बत। लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल में चीन केवल इस कारण तनकर खड़ा है कि 1951 से वह तिब्बत पर अवैध कब्जा करके भारत की सीमाओं तक आ पहुंचा है। चीन की गुस्ताखी तब तर्क-कुतर्क की सारी सीमाएं पार कर जाती है जब तिब्बत पर अपने कब्जे का हवाला देकर वह अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताकर दावा जताने लगता है। 

ऐसे में यह जरूरी है कि चीनी नेताओं के साथ डोकलाम, पैंगोंग झील और गलवन आदि में एक किमी और चार किमी की अर्थहीन बहस में उलझने के बजाय पूरे विवाद को एक नया आयाम दिया जाए।  भारत को चाहिए कि तिब्बत में चीन की अवैध उपस्थिति को चुनौती देते हुए उसे मुक्त करने की मांग करे। 

वुहान से निकला वायरस भले ही जानबूझकर छोड़ा गया हो या गलती से, चीन को जवाब तो देना ही होगा। अब तक अमेरिका, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देश चीन के खिलाफ कार्रवाई करने का इरादा जाहिर कर चुके हैं। इस वायरस का शिकार हो चुके भारत को भी चीन के खिलाफ इस अंतरराष्ट्रीय अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।

तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता देने के विकल्प को अगले कदम के रूप में संजोकर रखा जा सकता है। सौभाग्य से दुनिया में ऐसी सरकारों की कमी नहीं जो तिब्बत के सवाल पर भारत की पहल का इंतजार कर रही हैं।

अमेरिकी संसद में पिछले तीन महीने में तिब्बत के पक्ष में दो प्रस्तावों का विशाल बहुमत से पास होना और यूरोप के कम से कम दो हजार शहरों के नगरपालिका भवनों पर हर साल दस मार्च के दिन तिब्बत के झंडे को आधिकारिक तौर पर फहराया जाना अंतरराष्ट्रीय उत्सुकता के उदाहरण हैं।

चीन में बढ़ती अशांति की बारीकी से निगरानी करने वाले जासूसों और विश्लेषकों का मानना है कि इस पतन के तेज होने की संभावना है- “मीडिया पर क्रूर नियंत्रण के लिए धन्यवाद, चीन प्रांतों में सैकड़ों विरोध प्रदर्शनों के बारे में समाचार रिपोर्टों को म्यूट करने में कामयाब रहा। लेकिन कुछ भूमिगत कार्यकर्ताओं ने इस बात पर विवरण प्रदान किया है कि हम अब कम्युनिस्ट पार्टी की 19 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस के आगे शी जिनपिंग शासन के खिलाफ एक बड़े विद्रोह के रूप में जानते हैं, “सूत्रों ने कहा

“चीन आखिरकार एक टिपिंग बिंदु पर पहुंच रहा है और झिंजियांग, मंचूरिया, हांगकांग, तिब्बत, चेंगदू, झांगझुंग और शंघाई एक चीनी क्रांति के बाद मुक्त राष्ट्र में बदल सकते हैं।” 

टेंग ने कहा कि चीन में कुछ भारत विरोधी प्रदर्शनों को सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता चुपचाप एक लोकतांत्रिक सरकार को स्थापित करने के लिए चीन के एकदलीय शासन के खिलाफ क्रांति के लिए काम कर रहे हैं।

“हमें नहीं पता कि इसमें पाँच या 10 साल लगेंगे। यह स्पष्ट है कि हम इंतजार नहीं कर रहे हैं, लेकिन 1989 की तरह एक और क्रांति की तैयारी कर रहे हैं। जिनपिंग शासन द्वारा सोशल मीडिया और ब्लॉगों पर कार्रवाई के बावजूद, कार्यकर्ता और वकील अन्य माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं ताकि सूचना को बाहर निकालने और क्रांति की सहायता की जा सके।

शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी भी पार्टी और लोगों के बीच बड़े संकट और आर्थिक संकट का सामना कर रही है।

By Subhash Agrawal

भारत ही नहीं 23 देशों की जमीन पर हक जता रहा चीन, ड्रैगन का 43त्न हिस्सा अवैध कब्जा

वर्तमान परिस्थिति में चीन के होंगे टुकड़े, पाकिस्तान पर विभाजन का खतरा

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने उइगुर मुस्लिमों का उत्पीडऩ करने के जिम्मेदार चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। अब इस बिल को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए व्हाइट हाउस भेजा गया है। इस बिल के पास होने के बाद पाकिस्तान के सिंधी और बलूच काफी उत्साहित हैं और उन्हें यह लगता है कि जल्द ही अमेरिका में सिधं और बलूचों की आजादी का प्रस्ताव टेबल पर रखा जायेगा। 

चीन ने झिंजियांग के दूरस्थ पश्चिमी क्षेत्र में पुन: शिक्षा और प्रशिक्षण केंद्रों के लिए बढ़ती अंतरराष्ट्रीय निंदा का सामना किया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे 1 मिलियन से अधिक जातीय उइगरों और अन्य मुस्लिमों के सामूहिक निरोध शिविर हैं।

चीन, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक लंबी अवधि के व्यापार युद्ध को समाप्त करने की कोशिश कर रहा है, ने अपने राजनीतिक अधिकार को हांगकांग में हिंसक विरोध प्रदर्शनों द्वारा परीक्षण किया है, जिसे चीनी शासित शहर पर बीजिंग की सख्त पकड़ के रूप में देखा जाता है।हांगकांग में पुलिस ने पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ रबर की गोलियों, आंसू गैस और पानी के तोपों का इस्तेमाल किया है, जो दशकों में अपने सबसे खराब राजनीतिक संकट में डूब गया है।

चीन ने 1950 में सैनिकों को दूरस्थ, पहाड़ी तिब्बत में भेजा जो आधिकारिक रूप से एक शांतिपूर्ण मुक्ति के रूप में था और तब से एक लोहे की मु_ी के साथ वहां शासन किया है। तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा 1959 में चीनी शासन के खिलाफ एक विद्रोह के बाद भारत में भाग गए। चीन ने उसे एक खतरनाक प्रतिक्रियावादी ब्रांड बनाया है जो चीनी भूमि के लगभग एक चौथाई हिस्से को विभाजित करने का प्रयास करता है।

तुर्किस्तान (शिंजियांग )भी कर रहा चीन से आजादी की मांग!

एक तरफ इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान भारत में आतंकवाद फैला रहा है.. और दूसरी तरफ उस चीन के आगे बिछा जा रहा जहां मुसलमानों के ही अधिकारों को छीना जा रहा है.. ड्रैगन के देश में मौजूदा हाल ये है कि वहां मुसलमानों को लंबी दाढ़ी रखने.. टोपी पहनने और धार्मिक शिक्षा देने जैसे बुनिय़ादी अधिकारों तक पर रोक है.. बावजूद इसके दुनियाभर में मुसलमानों के मसीहा बनने वाले पाकिस्तान में बैठे आतंकियों और उनके आकाओं की जुबान बंद है

उइगुर मध्य एशिया में रहने वाले तुर्क समुदाय के लोग हैं जिनकी भाषा उइगुर भी तुर्क भाषा से काफी मिलती-जुलती है। उइगुर तारिम, जंगार और तरपान बेसिन के हिस्से में आबाद हैं। उइगुर खुद इन सभी इलाकों को उर्गिस्तान, पूर्वी तुर्किस्तान और कभी-कभी चीनी तुर्किस्तान के नाम से पुकारते हैं। इस इलाके की सीमा मंगोलिया, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के साथ-साथ चीन के गांसू एवं चिंघाई प्रांत एवं तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से मिलती है। चीन में इसे शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र (एक्सयूएआर) के नाम से जाना जाता है और यह इलाका चीन के क्षेत्रफल का करीब छठा हिस्सा है।

करीब दो हजार साल तक आज के शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र पर एक के बाद एक खानाबदोश तुर्क साम्राज्य ने शासन किया। उनमें उइगुर खागानत प्रमुख है जिसने आठवीं और नौवीं सदी में शासन किया। उइगुरों ने अपने अलग साम्राज्य की स्थापना की। मध्यकालीन उइगुर पांडुलिपि में उइगुर अली का उल्लेख है जिसका मतलब होता है उइगुरों का देश।उइगुर का चीनी इतिहास 1884 में शुरू होता है। चिंग वंश के दौरान इस क्षेत्र पर चीन की मांचू सरकार ने हमला किया और इस इलाके पर अपना दावा किया। फिर इस क्षेत्र को शिंजियांग नाम दिया गया जिसका मैंड्रीन में ‘नई सीमाÓ या ‘नया क्षेत्रÓ मतलब होता है।1933 और 1944 में दो बार उइगुर अलगाववादियों ने स्वतंत्र पूर्वी तुर्किस्तान गणराज्य की घोषणा की।1949 में चीन ने इस इलाके को अपने कब्जे में ले लिया और 1955 में इसका नाम बदलकर शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र कर दिया।

चीन में हुई 2003 की जनगणना में उइगुरों की आबादी करीब 90 लाख बताई गई थी जबकि अनाधिकारिक अनुमान में उनकी आबादी उससे भी ज्यादा है। उइगुर चीन के 55 अल्पसंख्यक समुदायों में से पांचवां सबसे बड़ा समुदाय है। 1949 से पहले तक चीन के शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र की कुल आबादी का 95 फीसदी उइगुर मुस्लिम थे लेकिन चीन में 60 सालों के कम्यूनिस्ट शासन के बाद अब वे सिर्फ 45 फीसदी रह गए हैं।

यूएस की ताइवान में भूमिका

अमेरिका अब तक ताइवान का सबसे महत्वपूर्ण दोस्त है, और इसका एकमात्र सहयोगी है।

विश्व युद्ध दो और शीत युद्ध के दौरान जाली रिश्ते ने 1979 में अपनी कड़ी परीक्षा दी, जब राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन के साथ संबंधों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए ताइवान की अमेरिकी राजनयिक मान्यता समाप्त कर दी।

अमेरिकी कांग्रेस ने इस कदम का जवाब देते हुए ताइवान संबंध अधिनियम पारित किया, जो रक्षात्मक हथियारों के साथ ताइवान को आपूर्ति करने का वादा करता है, और जोर देकर कहा कि चीन द्वारा किसी भी हमले को अमेरिका के लिए “गंभीर चिंता” माना जाएगा।

तब से, अमेरिकी नीति को “रणनीतिक अस्पष्टता” के रूप में वर्णित किया गया है, जो ताइवान की आर्थिक सफलता और लोकतंत्रीकरण के लिए अमेरिकी प्रशंसा के साथ एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में चीन के उद्भव को संतुलित करने की मांग कर रहा है।

1996 में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई गई, जब चीन ने ताइवान के पहले प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव की कोशिश करने और उसे प्रभावित करने के लिए उत्तेजक मिसाइल परीक्षण किए। जवाब में, अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने वियतनाम युद्ध के बाद से एशिया में अमेरिकी सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा प्रदर्शन करने का आदेश दिया, ताइवान स्ट्रेट के लिए जहाज भेजे और बीजिंग को एक स्पष्ट संदेश दिया।

भारत ही नहीं 23 देशों की जमीन पर हक जता रहा चीन, ड्रैगन का 43त्न हिस्सा अवैध कब्जा

चीन ने जिस तरह अक्साई चिन को हड़पा और अब पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी पर अपना कब्जा जमाने की नापाक कोशिश कर रहा है वह उसके लिए नया नहीं है। केवल भारत ही नहीं वह करीब दो दर्जन देशों की जमीनों पर कब्जा करना चाहता है। चीन की सीमा भले ही 14 देशों से लगती हो, लेकिन वह कम से 23 देशों की जमीन या समुद्री सीमाओं पर दावा जताता है। ला ट्रोबे यूनिवर्सिटी की एशिया सुरक्षा रिपोर्ट ने यह खुलासा किया है।  

चीन अब तक दूसरे देशों की 41 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि कब्जे में ले चुका है यह मौजूदा चीन का 43त्न हिस्सा है। यानी ड्रैगन ने अपनी विस्तारवादी नीति से पिछले 6-7 दशकों में अपने साइज को लगभग दोगुना कर लिया है और उसका लालच अभी खत्म नहीं हुआ है।

चीन ने 1949 में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना के बाद से जमीन हथियाने की नीति शुरू कर दी थी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2013 में सत्ता में आने के बाद से चीन भारत से लगी सीमा पर मोर्चेबंदी तेज की। लेकिन उसे पहली बार इतनी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। आइए उसके कुछ अवैध कब्जों पर नजर डालें। 

1.ईस्ट तुर्किस्तान

16.55 लाख वर्ग किमी का भूभाग। 1934 में पहले हमले के बाद 1949 तक चीन ने ईस्ट तुर्किस्तान पर कब्जा कर लिया। 45त्न आबादी वाले उइघुर मुस्लिमों के इस इलाके पर चीन जुल्म ढा रहा है। 

2. तिब्बत

12.3 लाख वर्ग किमी वाले इस सुंदर प्राकृतिक देश पर चीन ने 07अक्टूबर 1950 को कब्जा कर लिया। 80त्न बौद्ध आबादी वाले तिब्बत पर हमला कर उसने अपनी सीमा का विस्तार भारत तक कर लिया। इसके अलावा उसे यहां अपार खनिज, सिंधु, ब्रह्मपुत्र,मीकांग जैसी नदियों का स्रोत मिल गया। 

3. इनर मंगोलिया

11.83 लाख वर्ग किमी  भूभाग वाले इन मंगोलिया पर चीन ने अक्टूबर 1945 में हमला कर दिया और जमा लिया। 13 फीसदी आबादी वाले मंगोलों की आजादी की मांग को बुरी तरह कुचला डाला। यहां दुनिया का 25 फीसदी कोयला भंडार है। यहां की आबादी 3 करोड़ है।  

4. ताइवान

35 हजार वर्ग किमी वाले समुद्रों से चारों ओर से घिरे ताइवान पर लंबे समय से चीन की नजर है। 1949 में कम्युनिस्टों की जीत के बाद राष्ट्रवादियों ने ताइवान में शरण ली। चीन अपना हिस्सा मानता है, लेकिन ताइवान डटकर उसके सामने खड़ा है। ताइवान को अमेरिकी समर्थन प्राप्त है और इसलिए चीन चाहकर भी उस पर हमला नहीं कर पा रहा है। 

5. हांगकांग

चीन ने 1997 में हांगकांग पर जबरन कब्जा कर लिया। इन दिनों वह  राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू कर हांगकांग पर शिकंजा कसने की फिराक में है। 50.5 फीसदी चीन का विदेशी निवेश और व्यापार हांगकांग के जरिये ही आता है।

6. मकाउ

450 वर्ष के शासन के बाद 1999 में पुर्तगालियों ने चीन को मकाउ सौंप दिया। 

7. भारत

चीन ने भारत के 38 हजार वर्ग किमी पर कब्जा कर रखा है। 14,380 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अक्साई चिन का इसमें शामिल है। 5180 वर्ग किमी इलाका पीओके का पाक ने चीन को दिया।

8. पूर्वी चीन सागर

जापान से जद्दोजहद। 81 हजार वर्ग किमी के आठ द्वीपों पर चीन की नजर है। 2013 में चीन के वायु सीमा जोन बनाने से विवाद बढ़ गया था।

9. रूस से भी सीमा विवाद

रूस से 52 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर चीन का विवाद। 1969 में चीन की हमले की कोशिश, रूस से मुंह की खाई।

10. दक्षिण चीन सागर

इस क्षेत्र में 7 देशों से हड़पने की कोशिशताइवान, ब्रूनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, सिंगापुर से तनाव है। 35.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले दक्षिणी चीन सागर 90त्न क्षेत्र पर दावा करता है। चीन ने पारसले, स्पार्टले द्वीपों पर कब्जा जमाकर सैन्य अड्डे बनाए। यहां से 33त्न यानी 3.37 लाख करोड़ का सालाना वैश्विक कारोबार  77 अरब डॉलर का तेल, 266 लाख करोड़ क्यूबिक फीट गैस भंडार है।

चीन की मुश्किल

चीन ने माना है कि आर्थिक गलियारा संकट में है। 40 फीसदी परियोजनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ा है। 20 फीसदी प्रोजेक्ट बंद होने की कगार पर  हैं। 3.7 लाख करोड़ के गलियारे से 100 देश जुड़े थे।