Editorial :- टू एंड हाफ फ्रंट वार की साजिश में लीन  चीन-पाक और अलबदर याद करें 1954 व 65

2 July 2020

पंडित नेहरू ने १८ वर्ष में भारत को हर मोर्चों पर हार दिलाई थी। परंतु लाल बहादुर शास्त्री ने १८ महीने में वह कर दिखाया जिसे याद कर चीन और पाक दोनों की सिट्टी पिट्टी हो जायेगी गुम ।

लाल बहादुर शास्त्री ही पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सेना को यह छूट दी कि सेना जब भी उचित समझे एलओसी पार कर पाक में घुस सकती है। इसी कारण भारत की बहादुर सेना ने लाहौर की धरती पर तिरंगा फहरा दिया था।

अब लाल बहादुर शास्त्री के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही ऐसे हंै जिन्होंने भारत की सेना को यह स्वतंत्रता दी कि वह आवश्यक्तानुसार  लद्दाख भारत-चीन सीमा पर चीन से सामना करने के लिये जैसा उचित समझे वैसा निर्णय ले। 

अर्थात १९९३-१९९६ व २००५ में हुई संधि को मोदी सरकार ने दिया तलाक। क्या कांगे्रस भी देगी तलाक चीन को?मतलब यह है कि २००८ में  राहुल गांधी ने सोनिया गांधी की उपस्थिति में उस समय चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेके्रटी शी जिनपिंग के समक्ष एमओयू पर जो दस्तखत किये थे उसे भंग कर देना चाहिेये।

चीन को ये याद रखना चाहिये कि भारत अब १९६२ का भारत नहीं है २०२० का भारत है। उसे यह भी स्मरण रखना चाहिये कि १९५४ मेें और १९५६ में जब चाऊ एन लाई भारत का दौरा किये थे तो भारत आने के लिये चीन के पास हवाई जाहज तक नहीं था। भारत ने ही उन्हें लाने के लिये अपना हवाई जहाज भेजा था। अर्थात १९५४-५६ में भारत कम्युनिस्ट चीन से बहुत आगे था।

यहां तक कि चीनी प्रधान मंत्री की विदेश यात्राओं को भी एयर इंडिया के विमानों में रखा जाएगा। ऐसा ही एक विमान, द कश्मीर प्रिंसेस, एक चार्टर्ड लॉकहीड रु-749्र तारामंडल विमान, जिसमें चीनी सरकार के शीर्ष ब्रास को यात्रा करनी थी, जिसमें झोउ सहित, एक बम विस्फोट से मध्य-वायु क्षतिग्रस्त हो गई थी। झोउ, जो एक टूटे हुए परिशिष्ट के कारण वापस आयोजित किए गए थे, इस तरह से हत्या के प्रयास से बच गए। 

भारत के खिलाफ चीन-पाकिस्तान और अल बदर ने मिलाए हाथ

खुफिया जानकारियों के मुताबिक जो संकेत मिल रहे हैं उससे यह साफ हो रहा है कि पूर्वी लद्दाख में चीन जितनी भी चालबाजियां कर रहा है, उसमें उसके साथ पाकिस्तान भी पूरी तरह से शामिल हो चुका है। इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान के इलाके में नियंत्रण रेखा के आसपास दो डिविजन जवानों की तैनाती कर रहा है। यही नहीं चीन के अधिकारी जम्मू-कश्मीर के अंदर हिंसा भड़काने के लिए लगभग मर चुके पाकिस्तानी आतंकी संगठन अल बदर के सरगनाओं से भी बातचीत करने में लगे हुए हैं। यानि भारतीय सेना को ड्रैगन का सामना सिर्फ पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो में ही नहीं करना है। उसे उत्तरी लद्दाख के पाकिस्तानी कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान से सटे नियंत्रण रेखा पर भी मोर्चा संभालना है और जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खूनी इरादों को भी कुलचना है।

अर्थात भारत के विरूद्ध टू एंड हाफ फं्रटवार की साजिश में है चीन और पाक

्रचीन और पाक तथा अलबदर को याद रखना चाहिये कि भारत इसे एक अच्छा अवसर मानकर पंडित नेहरू ने जो गलती १९४७ और १९६२ में की थी उसकी भरपाई करेगा। १९४७ में युद्ध विराम कर पंडित नेहरू ने पाकिस्तान को पीओके गिफ्ट कर दिया था। अब भारत को अवसर मिला है कि वह पीओके पर सर्जिकल स्ट्राईक करे। पीओके  की जनता तो पाकिस्तान के विरूद्ध भारत की सेना का समर्थन करने को तत्पर है।

१९६२ से चीन ने भारत के ४५०० कि.मी भूभाग पर जिसमें अक्साई चीन भी सम्मिलित है जबरन कब्जा कर रखा है। अब अवसर आया है  कि भारत अपने उस भूभाग को वापस चीन से ले ले।

अलबदर तथा अन्य पाक प्रोयोजित आतंकवादी संगठनों को भी समझ जाना चाहिये कि ३७० अनुच्छेद निष्प्रभावी होने के बाद अब कश्मीर की जनता भी उनके अत्याचारों से ऊब चुकी है। 

्रआज का ही उदाहरण लें  आतंकवादी कश्मीर के सोपोर में एक मस्जिद में छिप कर गोली-बारी कर रहे थे जिससे एक कश्मीरी को गोली लग गई और वह गिर पड़ा। उसके मृत शरीर पर ३ वर्ष का बच्चा बैठा हुआ था। भारत के सैनिक अपनी जान की परवाह न कर उस बच्चे को इशारे से अपने पास बुलाया और गोद में लिया। यह दृश्य क्या बताता है? 

सारांश यह है कि : टू एंड हाफ फ्रंट वार की साजिश में लीन चीन-पाक और अलबदर याद करें 1954 व 65 ।

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दिसंबर 1956 में था जब चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने दिल्ली, मद्रास और कलकत्ता का दौरा किया और रंगून की ओर रवाना हुए। झोउ चीन के पीपुल्स रिपब्लिक का पहला प्रीमियर था और सरकार के प्रमुख के रूप में, अध्यक्ष माओत्से तुंग के तहत अक्टूबर 1949 से सेवारत, कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता में वृद्धि और बाद में अपने नियंत्रण को मजबूत करने, विदेश नीति बनाने और विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। चीनी अर्थव्यवस्था। वह बाहरी दुनिया के लिए चीन का चेहरा था। 

 जब दिसंबर 1956 में झोउ ने मद्रास का दौरा किया, तो भारत आर्थिक रूप से कम्युनिस्ट चीन से बहुत आगे था। यहां तक कि चीनी प्रधान मंत्री की विदेश यात्राओं को भी एयर इंडिया के विमानों में रखा जाएगा। ऐसा ही एक विमान, द कश्मीर प्रिंसेस, एक चार्टर्ड लॉकहीड रु-749्र तारामंडल विमान, जिसमें चीनी सरकार के शीर्ष ब्रास को यात्रा करनी थी, जिसमें झोउ सहित, एक बम विस्फोट से मध्य-वायु क्षतिग्रस्त हो गई थी। झोउ, जो एक टूटे हुए परिशिष्ट के कारण वापस आयोजित किए गए थे, इस तरह से हत्या के प्रयास से बच गए। 

दिसंबर 1956 के पहले सप्ताह के आसपास, झोउ मद्रास राजघराने में रहे और कई कार्यक्रमों में भाग लिया। शहर भर में प्रीमियर के लिए लोगों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा और सड़कों पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। कम्युनिस्ट बंगाली कवि हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (सरोजिनी नायडू के भाई) का एक गीत हिंदी चीनी भाई भाई, जो काफी लोकप्रिय हो गया था, लगभग सभी कार्यक्रमों में कोरस के रूप में गाया गया था। झोउ को गैलरी से खेलना पसंद था और उन्होंने अपने अधिकांश भाषण हिंदी चीनी भाई भाई के साथ समाप्त किए और दर्शकों ने खड़े-खड़े ओवेशन के साथ अपनी स्वीकृति दी।