Editorial :- नेहरू के हिमालियन ब्लंडर्स के कारण  आज चीन-पाकिस्तान-नेपाल बने समस्या

 3 July 2020

आज के इस संपादकीय की विषय वस्तु आज के ही कुछ समाचार है : 

1.    अब रूस के व्लादिवोस्तोक शहर पर चीन का दावा, कहा-1860 से पहले हमारा था

2. चीन की आतंकी करतूत से परेशान म्यांमार, दुनिया से मांगी मदद

3.भारत के खिलाफ खोला था मोर्चा, खुद अपने देश में घिरे नेपाली पीएम!

चीन ने अपनी गिरफ्त में पड़ोसी मुल्क नेपाल को भी ले लिया है, पैसे के दम पर नेपाल को अपने इशारों पर नचा रहा है. यही वजह है कि चीन-पाकिस्तान के अलावा नेपाल भी भारत को आंख दिखाने लगा. नेपाल की ओली सरकार ने नए नक्शे में भारत के इलाके को अपना बता दिया. ये सबकुछ चीन की शह पर हो रहा था. अब ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ही उनसे इस्तीफा मांग रही है. उसके नेता कह रहे हैं कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए ओली भारत विरोधी।

4.चीन ने भारत के खिलाफ नेपाल में भेजे जासूस, पाकिस्तान भी रच रहा बड़ी साजिश।

भारत-नेपाल विलय – साल 1952 में नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन विक्रम शाह और नेपाल के प्रधानमंत्री मत्रिकाप्रसाद कोइराला को भारत में हिमालयी राज्य को शामिल करने के प्रस्ताव से इनकार कर दिया था। नेपाल को भारत मे विलय कर लेने की बात पंडित ज्वाहरलाल नेहरू से कही थी. लेकिन नेहरू ने बात टाल दी. उन्होंने कहा की नेपाल भारत में विलय होने से दोनों देशों को फायदे के बजाय नुकसान होगा और नेपाल का टूरिज्म भी बंद हो जाएगा.

  पंचशील समझौता  – नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। नेहरूने 1954 को चीन के साथ पंचशील समझौता किया। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया।

नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के ‘कब्जेÓ को मंजूरी दे दी। बाद मे 1962 मे जब भारत चिन युद्ध हुआ तो चिनी सेना ईसी तिब्बत के मार्ग से भारत के अंदर तक घुस आई.

1962 भारत चीन युद्ध -चीनी सेना ने 1962 में भारत को हराया था। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने ले.जनरल हेंडरसन और कमान्डेंट ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था।

चीनी सेना जब अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम तक अंदर घुस आई थी, तब भी नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए भारतीय सेना को चीन के खिलाफ एक्शन लेने से रोके रखा। परिणाम स्वरूप हमारे कश्मीर का लगभग 14000 वर्ग किमी भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया। इसमें कैलाश पर्वत, मानसरोवर और अन्य तीर्थ स्थान आते हैं।

 बलूचिस्तान – खान ऑफ़  काळात भारत में मिलना चाहते थे या वे स्वतंत्र रहना चाहते थे पर नेहरू को वे दोनों बाते मंजूर नहीं थी।  ‘शायद नेहरू सरकार  बलूचिस्तान के सामरिक महत्व को समझने में विफ ल रही।Ó

1949 चीन स्वतंत्र हुआ तो गैर कम्युनिस्ट देशों में भारत दूसरा देश था जिसने चीन को मान्यता दी थी।

1950 में अमेरिका ने और 1955 में रूस ने नेहरू को दिया था प्रस्ताव भारत बने हृस्ष्ट स्थायी सदस्य । परंतु पं. नेहरू ने इन दोनों प्रस्तावों को ठुकराकर यह सलाह दी की एशिया में शांति बने रहे इसके लिये भारत की जगह चीन को हृस्ष्ट स्थायी सदस्य बना दिया जाये। 

1950 -60 के दशक में अमरीका ने भारत को ऑफर दिया था की वो एशिया में सबसे पहले परमाणु कार्यक्रम शुरू करे ये ऑफर तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉनफ़ कैनेडी ने नेहरू को दिया था पर नेहरू ने ये कहकर इनकार कर दिया की भारत को परमाणु शक्ति होने की क्या जरुरत 

1954-56 में भारत के जेट प्लेन से भारत आये थे चाउ एनलाई उस समय भारत चीन से ज्यादा संपन्न था। चीन के पास अपना  स्वयं का जेट विमान नहीं था ।

पंचशील समझौता -नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। नेहरूने 1954 को चीन के साथ पंचशील समझौता किया। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया।

नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के ‘कब्जेÓ को मंजूरी दे दी। बाद मे 1962 मे जब भारत चिन युद्ध हुआ तो चिनी सेना ईसी तिब्बत के मार्ग से भारत के अंदर तक घुस आई.

 उसके बाद 1962 में चीन ने हमला कर दिया, अगर भारत परमाणु शक्ति बन गया होता तो चीन की क्या हैसियत थी चूँकि चीन तो स्वयं 1964 में परमाणु शक्ति बना था, नेहरू ने कैनेडी का ऑफर स्वीकारा होता तो भारत एशिया का सबसे पहला परमाणु शक्ति होता और उसे 1974 में बने हृस्त्र की सदस्यता बिना कुछ मेहनत किये मिल जाती 

1962 युद्ध के समय भारत के रक्षामंत्री चीन परस्त कामरेड कृष्ण मेनन थे। इसी कारण उस युद्ध में भारत की वायुसेना का उपयोग जानबूझकर नहीं किया गया। 

 प्रधानमंत्री बनने की लालसा में 1947 में पंडित नेहरू ने देश का विभाजन स्वीकार किया। आश्चर्य की बात है कि उस स्वतंत्रता समारोह में महात्मा गांधी उपस्थित नहीं हुए, वे कलकत्ता शहर के एक मकान में रहते हुए पश्चाताप करते रहे।  जुलाई 1947 में उन्होंने कहा था ।

“मैं 15 अगस्त को आनन्दित नहीं कर सकता। मैं आपको धोखा नहीं देना चाहता। लेकिन साथ ही मैं आपको आनन्दित नहीं होने के लिए नहीं कहूंगा। दुर्भाग्य से आज हमें जिस तरह की आजादी मिली है, उसमें भारत और पाकिस्तान के बीच भविष्य के टकराव के बीज भी हैं।” । इसलिए हम दीपक कैसे जला सकते हैं?

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नेहरू की गलतियों से चीन बना भष्मासुर

 प्रधानमंत्री बनने की लालसा में १९४७ में पंडित नेहरू ने देश का विभाजन स्वीकार किया। आश्चर्य की बात है कि उस स्वतंत्रता समारोह में महात्मा गांधी उपस्थित नहीं हुए, वे कलकत्ता शहर के एक मकान में रहते हुए पश्चाताप करते रहे। 

 बलूचिस्तान – खान ऑफ़  काळात भारत में मिलना चाहते थे या वे स्वतंत्र रहना चाहते थे पर नेहरू को वे दोनों बाते मंजूर नहीं थी।  ‘शायद नेहरू सरकार  बलूचिस्तान के सामरिक महत्व को समझने में विफ ल रही।Ó

1946 में, कलात के खान बलूचिस्तान के भाग्य पर शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व के साथ चर्चा में थे। वास्तव में, उनके एक प्रतिनिधि ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष अबुल कलाम आज़ाद से भी मुलाकात की, लेकिन मौलाना ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बलूचिस्तान के विचार पर सवाल उठाया। इससे भी बदतर, अगर ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक, फॉरेन पॉलिसी सेंटर की एक रिपोर्ट की मानें, तो नेहरू ने 1947 में कलात के खान द्वारा हस्ताक्षरित परिग्रहण पत्र वापस कर दिया।

नेहरू का बलूचिस्तान ब्लोपर उनके हिमालयी विस्फोट के समान विनाशकारी था: उत्पल कुमार

** बलूचिस्तान का अलगाव, तिलक देवाशर लिखते हैं, दो गुना है। एक “बलूच कथा” है कि “स्वतंत्र होने की अमिट ऐतिहासिक यादों पर टिका है और लोगों को लगता है कि वे पाकिस्तान से भाग जाने के लिए मजबूर हो गए हैं”। लेखक ने बलूच राजनीतिक नेता अब्दुल हई बलूच के हवाले से कहा, “इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया गया कि पाकिस्तान एक बहु-मुल्क है। पाकिस्तान 1947 में अस्तित्व में आया था, लेकिन बलूच, पठान, सिंधी, पंजाबी और सेराकिस यहां सदियों से हैं। उनकी अपनी संस्कृतियाँ और भाषाएँ हैं। “

 भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी कहाँ थे?

 पश्चिम का कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कहता है: निश्चित रूप से वह व्यक्ति जिसने स्वतंत्रता के लिए भारतीय आंदोलन का नेतृत्व किया था, और जो अभी भी भारत का स्वीकृत नेता था, अंग्रेजों को भारतीयों को सौंप दिया जाएगा। वह निश्चित रूप से उत्सव में एक प्रमुख हिस्सा लेंगे। लेकिन वह सिर्फ वहीं है जहां वह नहीं था। आधा दर्जन भारतीयों से पूछें कि गांधी 15 अगस्त 1947 को कहां थे, और आपको आधा दर्जन अलग-अलग जवाब मिल सकते हैं। लेकिन सभी सहमत होंगे कि वह दिल्ली में नहीं थे।

15 अगस्त, 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के पीएम के रूप में शपथ ली।

महात्मा गांधी ने इस अवसर पर जश्न नहीं मनाया।

उन्होंने कहा कि इस दिन में भारत, पाकिस्तान के बीच संघर्ष के बीज शामिल हैं।

नेहरू के हिमालयन ब्लंडर्स 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 सेप्टेम्बर रविवार को कहा कि जवाहरलाल नेहरू के जम्मू-कश्मीर से निपटने में गलती की।  इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के पास पहुंचने से “हिमालयी विस्फोट से अधिक” था, और जोर देकर कहा कि पूरी दुनिया ने राज्य की विशेष स्थिति अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के कदम का समर्थन किया है।

नेपाल के भारत में विलय के प्रस्ताव को खारिज करने के लिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 

भारत और नेपाल ने 1950 में दो दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक संबंध स्थापित करते हुए एक द्विपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए। इसे प्रसिद्ध कहा जाता है – ‘1950 की भारत-नेपाल संधि शांति और मित्रता।Ó यह संधि मूल रूप से नेपाली नागरिकों के द्यद्ब4द्ग  भारत में आर्थिक अवसरों की पेशकश करती थी, जिसमें भारत के सुरक्षा चिंताओं का सम्मान किया जाएगा। इस समझौते पर नेपाल के पीएम मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा के साथ भारतीय राजदूत चंदेश्वर नारायण सिंह (प्रोटोकॉल का अनादर) ने हस्ताक्षर किए थे। 

पुरानी यह संधि वर्ष 2008 में खतरे में थी जब नेपाल में एक महासंघ की सरकार बनी थी। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेता पुष्पा कमल दहल ने कहा था कि भारत के साथ 1950 की संधि को खत्म कर दिया जाएगा और भारत के साथ एक नए समझौते पर बातचीत की जाएगी। हालांकि, वह इस मामले को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थे और उन्हें अपने कार्यकाल के 9 महीनों के भीतर इस्तीफा देना पड़ा।

जून 10, 2008  हृ्रत्रक्कक्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख केएस सुदर्शन ने रविवार को आजादी के तुरंत बाद अन्य रियासतों की तर्ज पर नेपाल के भारत में विलय के प्रस्ताव को खारिज करने के लिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। सुदर्शन ने नेहरू को नेपाल और तिब्बत में आज की उथल-पुथल के लिए जिम्मेदार ठहराया, जो उन्होंने कहा, पड़ोसी की विस्तारवादी प्रवृत्ति के बारे में पता होने के बावजूद, उन्हें चीन द्वारा सौंप दिया गया था।

सुदर्शन ने कहा कि नेहरू के हिस्से में यह गलती थी कि उन्होंने नेपाल के प्रधान मंत्री मत्रिकाप्रसाद कोइराला को भारत में हिमालयी राज्य को शामिल करने के प्रस्ताव से इनकार कर दिया था।

  यह कहते हुए कि निजी स्वार्थ या स्वार्थों के लिए राष्ट्रीय हितों की बलि दी जा रही है, सुदर्शन ने कहा कि तिब्बत में चीन की ज्यादती नेहरू की मूर्खता का नतीजा थी। उन्होंने कहा, “नेहरू के पास तिब्बत को चीन को सौंपने का कोई स्वामित्व नहीं था, जो अब अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर अपना दावा ठोक रहा है।”

अब म्यांमार ने जमकर भड़ास निकाली है। म्यांमार आर्मी चीफ ने तल्ख लहजे में चीन को चेतावनी देते हुए कहा कि वह यहां के आतंकी समूहों को हथियार न दे। जनरल ने इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग की भी मांग की।

  द्ब) कोको आईलैंड- जवाहरलाल नेहरू ने सन 1950 में भारत का कोको द्वीप समूह मयन मान को गिफ्ट दे दिया. बता दे यह आईलैंड कोलकाता से सिर्फ 900 किलोमीटर दूरी पर है. बाद में मयन मारने कोको द्वीप समूह चाइना को किराए पर दे दिया. जहां से आज भी चाइना भारत की हर गतिविधियों पर नजर रखता है.

द्बद्ब) काबू व्हेली मणिपुर – वह दिन 13 जनवरी 1954 था जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के मणिपुर प्रांत की काबू वैली दोस्ती के नाम पर म्यानमार को दे दिया. उसके बाद एक बार फिर वही हुआ जिसका डर था. म्यानमार ने फिर से यह जगह चाइना को दे दिया. जिसके वजह से आज भी चाइना भारत पर नजर रखता है. बता दें काबू दुनिया के सबसे खूबसूरत जगह में से एक है. जिसकी तुलना कश्मीर से की जाती है.

पंडित नेहरू ने १९४७ में पाकिस्तान को पीओके गिफ्ट कर दिया।

*7) पंचशील समझौता -* नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। नेहरूने 1954 को चीन के साथ पंचशील समझौता किया। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया।

नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के ‘कब्जेÓ को मंजूरी दे दी। बाद मे 1962 मे जब भारत चिन युद्ध हुआ तो चिनी सेना ईसी तिब्बत के मार्ग से भारत के अंदर तक घुस आई.

1962 भारत चीन युद्ध* -चीनी सेना ने 1962 में भारत को हराया था। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने ले.जनरल हेंडरसन और कमान्डेंट ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था।

चीनी सेना जब अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम तक अंदर घुस आई थी, तब भी नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए भारतीय सेना को चीन के खिलाफ एक्शन लेने से रोके रखा। परिणाम स्वरूप हमारे कश्मीर का लगभग 14000 वर्ग किमी भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया। इसमें कैलाश पर्वत, मानसरोवर और अन्य तीर्थ स्थान आते हैं।