जैन मुनि तरुण सागर नहीं रहे, लेकिन उनके विचार… उनके उपदेश… उनके प्रवचन, कभी मर नहीं सकते हैं! जैन मुनि तरुण सागर को सुनने के… पढऩे के, अनेक अवसर मिले, आम तौर पर संत आध्यात्मिक जगत की बात करते हैं, लेकिन जैन मुनि तरुण सागर सबसे अलग, श्रेष्ठ संत इसलिए हैं कि वे केवल आध्यात्मिक जगत की बात नहीं करते हैं, वे भौतिक जगत के सैद्धान्तिक पक्ष की बात करते हैं और प्रायोगिक समाधान की राह भी दिखाते हैं… यही वजह है कि उनके कड़वे प्रवचन गुजरते समय के साथ मीठे लगने लगते हैं!
उन्होंने बेहतर राष्ट्र के लिए… अच्छे मानव समाज के लिए, धर्म और समाज की कईं स्थापित अदृश्य सीमाएं तोड़ दी जो उनके विचारों से, उनके व्यवहार से अक्सर झलकती रही! कुछ वर्षों पूर्व डॉ. युधिष्ठिर त्रिवेदी ने विभिन्न विषयों पर जैन मुनि तरुण सागर से बातचीत की थी जिसके प्रमुख अंश उनके संत नजरिए की झलक प्रस्तुत करते हैं… महावीर जयंती पर संदेश के सवाल पर जैन मुनि तरुण सागर का कहना था कि कि जैन समाज के दिगंबर, श्वेताम्बर जैसे विशेषणों को कुछ समय तक एक तरफ रख दिया जाए और केवल जैन शब्द का ही उपयोग एवं विश्लेषण किया जाए तो यह महावीर स्वामी की सच्ची श्रद्धांजलि होगी! दुनिया आज बारूद के ढेर पर बैठी है, तब आदर्श विश्व निर्माण में भगवान महावीर द्वारा दी गई शिक्षाएं महत्वपूर्ण हैं. महावीर की शिक्षाएं दरअसल आदर्श नागरिक की आचार संहिता हैं.
आपके चार प्रमुख सपनों में से एक, महावीर को मंदिरों के कब्जे से बाहर करना था, इन्दौर में साकार हुआ, इस दिशा में आगे कहां तक बढऩा हैं? के जवाब में उन्होने कहा कि सपना सफल हो गया हैं… सार्वजनिक कार्यक्रमों में जैनियों के अलावा छत्तीस कौम के नागरिक आ कर सुनते हैं, यहीं मैं चाहता था! सहज मानवीय कमजोरी के तहत व्यक्ति या समुदाय अपने धर्म के नाम पर खुलकर दान देता हैं, परन्तु राष्ट्रहित या सम्पूर्ण समाज हित में पीछे हट जाते हैं, क्यों? वे बोले- समाज में प्रचलित आस्था है कि धर्म के नाम पर किया गया दान ही कई गुना होकर वापस प्राप्त हो जाता है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. सेवा भी परम धर्म है और जरूरतमंदों की सेवा में व्यय किया गया धन भी कई गुना होकर ही लौटता है! आपको राष्ट्रसंत का सम्माननीय दर्जा प्राप्त है, इस नाते आप अपने अनुयायियों को मंदिर-मस्जिद के बजाय राष्ट्र के हित के लिये विचार करने, काम करने में प्रेरित करने में कहां तक सक्षम हुए हैं? उन्होंने कहा, तीन चीजें हैं- राष्ट्र, धर्म और व्यक्ति, पहली प्राथमिकता राष्ट्र है… राष्ट्र रहेगा तो धर्म बचेगा और धर्म बचेगा तो व्यक्ति बचेगा, यही प्रेरणा देने का प्रयास में करता हूं! प्रश्न-राष्ट्र संत के रूप में किसी ऐसे राष्ट्रीय स्मारक के निमाज़्ण योजना आपके पास विचारधीन है.
जो धन, गन, मन में राष्ट्रीयता के भावों के जागरण में सक्षम भूमिका निभा सकें ? आपके प्रवचन में जैन समाज के अलावा सभी समाजों के लोग बड़ी संख्या में आते हैं, ऐसा सौभाग्य कम ही साधु-संतो को मिलता है, इसकी मुख्य वजह क्या है? वे बोले- मैं धर्म पर बोलने के बजाय जीवन पर बोलता हूं. शायद इसी वजह से बड़ी संख्या में सभी समाजों के लोग आते हैं! जैन मुनि तरुण सागर ने अनेक अवसरों पर, अनेक मुद्दों पर, अपनी निर्भीक राय रखी, स्पष्ट विचार रखे, जो कई लोग महसूस तो करते हैं, मानते भी हैं, लेकिन व्यक्त करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं, और इसीलिए उनके कड़वे-मीठे प्रवचनों से आप सहमत हों या नहीं, अलग नजरिए से सोचने पर तो मजबूर करते ही हैं!

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