राजस्थान में 7 दिसंबर 2018 से विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। एक बार फिर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के लिए और आगामी लोकसभा चुनाव 2019 से पहले भारतीय जनता पार्टी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। राज्य में पिछले कुछ विधानसभा चुनावों से लगातार सत्ता बदलने का ट्रेंड रहा है और इसीलिए यहां बीजेपी के लिए चुनौती बढ़ती नजर आ रही है। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा का ध्यान इस ट्रेंड को ध्वस्त करने पर है। वसुंधरा राजे पार्टी की जीत सुनिश्चित करने में तो जुटी ही हैं लेकिन इस बार उनके विधानसभा क्षेत्र में भी मुकाबला दिलचस्प है और इसे लेकर लगातार खबरें भी सामने आ रही हैं।

मुख्यमंत्री वसुंधरा ने बीते 17 नवंबर को झालरापाटन की विधानसभा सीट से नामांकन दाखिल किया था। वह इस सीट से चौथी बार चुनाव लड़ रही हैं और 2003 के बाद पिछले तीन विधानसभा चुनावों से यहां अजेय रही हैं। इस बार वसुंधरा के किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं। कहा जा रहा था कि मुख्यमंत्री किसी सुरक्षित सीट की तलाश में हैं हालांकि बाद में खुद वसुंधरा ने साफ कर दिया कि वह झालावाड़ क्षेत्र से अपना सालों पुराना रिश्ता नहीं टूटने देंगी।

राजस्थान की सीएम के खिलाफ कांग्रेस ने मानवेंद्र सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। जिसके बाद झालरापाटन की विधानसभा सीट अपने आप में दिलचस्प हो गई है और यहां के सियासी समर पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं। दरअसल मानवेंद्र सिंह और वसुंधरा राजे के परिवार के बीच पुरानी खीचतान रही है। कई लोग इस चुनाव को वसुंधरा राजे के स्वाभिमान और मानवेंद्र सिंह के बदले की लड़ाई भी बता रहे हैं।  चुनाव को लेकर हुए सर्वे इस बात की ओर इशारा करते हैं कि राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर मौजूद है यहां सरकार बदल सकती है। इस बीच राजे इन पूर्वानुमानों को गलत साबित कर फिर से जीत दर्ज करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। उनके लिए अपनी विधानसभा सीट और राज्य में बीजेपी सरकार कायम रखने की दोहरी चुनौती हैं। बीजेपी नेताओं और कई जगह लोगों का ऐसा मानना है कि झालरापाटन की सीट पर राजे को हराना शायद मुश्किल हो लेकिन विधानसभा क्षेत्र में दिलचस्प सियासी टक्कर ने सीएम राजे को सीट पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने पर मजबूर जरूर कर दिया है।

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