मध्यप्रदेश वर्ष 1956 में जब से अपने वजूद में आया तब से राज्य में कांग्रेस ही सत्ता में रही है। देखा जाए तो राज्य में मुख्य रुप से दो ही पार्टियों का दबदबा रहा है। कांग्रेस और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी)। आज राज्य में विधानसभा चुनाव है और अब ये चुनाव महज कांग्रेस और भाजपा की हार जीत का फैसला नहीं करेगा इस चुनाव के साथ ही फैसला होगा राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भविष्य का।

फिलहाल बीजेपी में अमित शाह और पीएम मोदी ये दोनों बड़े नेता हैं। यदि शिवराज सिंह चौहान इस बार भी चुनाव जीतते हैं तो उनका औहदा पार्टी में बढ़ जाएगा। मतलब की वो पार्टी में तीसरे नंबर के नेता के तौर पर खड़े हो जाएंगे।

चुनाव हारे तो पार्टी में गिर जाएगा शिवराज का कद 
यदि शिवराज इस बार ये चुनाव हार जाते हैं तो ना सिर्फ राज्य की सत्ता उनके हाथ से जाएगी बल्कि पार्टी में भी उनका स्थान कम हो जाएगा। हालांकि बीजेपी ने अपना पूरा दाव शिवराज को लेकर ही खेला है तभी पार्टी ने राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान विज्ञापनों में भी अन्य किसी नेता की जगह अमित शाह, पीएम मोदी और शिवराज को दी।

शिवराज ने जब अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी तो वो अकेले नहीं थे। उनके साथ अन्य नेताओं ने भी अपने-अपने राजनीतिक सफर शुरु किए थे। इस चुनाव से उन्हें भी मुख्य धारा में नहीं आने दिया गया। हालांकि ऐसा नहीं है कि वो काम नहीं कर रहे थे। काम सब कर रहे थे लेकिन बीजेपी ने अपना पूरा दाव सिर्फ शिवराज पर ही खेला। यही वजह है कि शिवराज के अलावा किसी दूसरे नेता को तवज्जों नहीं दी गई।

पहली बार एजेंसियों के हाथ में प्रचार की कमान 

इस चुनाव में एक नया पहलू ये देखने को मिला की बीजेपी ने पहली बार चुनाव कार्यकर्ता को आधार बनाकर नहीं लड़ा बल्कि इस बार प्रोफेशनल एजेंसियों को ये काम दिया गया। हालांकि कार्यकर्ता भी अपना-अपना काम कर ही रहे थे। पहले के चुनाव और इस चुनाव में यही सबसे बड़ा अंतर था कि इससे पहले कार्यकर्ता अपने हिसाब से काम करते थे और इस बार उन्होंने महज निर्देशों का पालन किया। शिवराज की छवि बनाने को लेकर तमाम कामों की जिम्मेदारी एजेंसी के पास ही थी। ऐसी जिम्मेदारी किसी को नहीं दी गई थी जिस तरह की जिम्मेदारी पहले दी जाती थी।

पार्टी में कांग्रेस जैसा विद्रोह 
कई बार कांग्रेस में विद्रोह देखने को मिला। अब बीजेपी में भी विद्रोह के सुर देखने को मिल रहे हैं। पहले पार्टी में कुशाभाऊ ठाकरे जैसे नेता थे जो बाकी नेताओं को डांटकर चुप करा देते थे उनकी बात भी बाकी नेता सुनते थे। लेकिन अब पार्टी में वैसा एक भी नेता नहीं है। इस बार सब कुछ पूरा चुनाव शिवराज पर ही केंद्रित था। चुनाव की पूरी भाग-डोर अमित शाह के हाथों में थी। यही वजह थी कि वर्तमान नेता भी बूढ़े विद्रोहियों तक से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

शिवराज की अगुवाई में बीजेपी ने राज्य में 13 साल शासन किया है। साथ ही सबसे कड़वा सच ये भी है कि अगर अभी मतदान करवा लिया जाए तो पार्टी के 165 नेताओं में से एक भी ऐसा नेता नहीं होगा जो शिवराज के पक्ष में मतदान दे।
ऐसे शिवराज बने थे मुख्यमंत्री 
साल 2005 में प्रमोद महाजन उमा भारती से बदला लेना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने शिवराज को सांसद से मुख्यमंत्री बनवाया। बाद में हवा उनके पक्ष में रही, वो लंबे समय के लिए मुख्यमंत्री रहे। हालांकि अपने 13 साल के कार्यकाल में शिवराज और उनके परिवार पर कई लांछन लगे। ऐसा नहीं है कि आज उनका दामन पाक साफ हो गया है। आज भी उनपर लांछन लग रहे हैं इसके बावजूद भी उनकी छवि ज्यादा खराब नहीं हुई है।

जिस तरह से बीजेपी नेतृत्व ने उन्हें इस चुनाव में आगे किया है उससे साफ होता है अगर वो जीत जाते हैं तो बीजेपी में उनका कद काफी बढ़ जाएगा। यदि वो हारे तो ये कहना गलत नहीं होगा कि उनकी स्थिति ठीक कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह जैसी हो जाएगी जब वो 2003 में चुनाव हारे थे तब पार्टी में किस तरह उनका कद कम हुआ था। अब ये चुनाव का फैसला चुनाव के नतीजे आने के बाद ही होगा।

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