मध्‍य प्रदेश में चुनाव खत्‍म हो चुका है. प्रत्‍याशियों के भाग्‍य EVM में लॉक हो चुका है और राज्‍य में EVM की सुरक्षा को लेकर रार जारी है. जब राज्‍य में कांग्रेस और बीजेपी के स्‍टार प्रचारक वोटरों को लुभाने में लगे थे तो उस वक्‍त न्‍यूज नेशन संवाददाता मध्‍य प्रदेश के सुदूर ग्रामीणों के मन में चुनाव को लेकर चल रहे उथल पुथल को भांप रहे थे. मतदाताओं से प्रदेश के हर मुद्दे पर उन्‍होंने सवाल किए. मतदाताओं ने मौजूदा शिवराज सरकार के बारे में जो बातें बताईं वो आने वाले 11 दिसंबर को भावी सरकार की छवि बना रही थी. आइए देखते हैं क्‍या चल रहा था मध्‍य प्रदेश के मतदाताओं के मन में..
“शिवराज तो ठीक है, लेकिन दिल्ली वाले काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री ने काम तो किया है लेकिन इस बार कांग्रेस को वोट देंगे, किसानों के साथ बहुत अन्याय हुआ है”. मंदसौर की मंडी में प्याज के ढेरों के बीच अपनी बारी का इंतजार करते हुए किसानों के बीच से ये आवाज उभर कर आ रही थी. मंदसौर किसानों के गुस्से को मापने के लिए सही बैरोमीटर लग रहा था. प्याज 60 पैसे किलो से लेकर 4 रुपये किलो तक बिक रहा है. एक किसान ने 60 पैसे वाली पर्ची दिखाई और चेहरे पर बेबसी के बीच मु्स्कुराते हुए कहा कि और क्या बो सकते है हम.

थोड़ी दूर सामने दूसरे हिस्से में पहुंचे तो दिखा कि वो लहसुन का हिस्सा है. लहसुन और मंदसौर इस तरह से जुड़े हुए है कि 90 के दशक में इँडिया टूडे की एक स्टोरी थी जिसमें लहसुन के चलते मंदसौर के किसानों की ई बदलती किस्मत का जिक्र था. ऐसी कहानी जिसमें किसानों ने 200 से ज्यादा ट्रैक्टर खरीदे थे और सैंकड़ों डिश एंटिनों के खरीदने का जिक्र किया था. मंदसौर की खेती तब से कई उतार चढ़ाव देख चुकी है. लेकिन मंदसौर में इस बार किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प में किसानों की मौत ने राज्य का राजनीतिक समीकरण जैसे एक दम से बदल दिया था. दिग्विजय सिंह के कर्मों से राजनीतिक रसातल में गुम हो चुकी कांग्रेस संजीवनी हासिल कर सत्ता के लिए खम ठौंकने की हैसियत में आ गई. प्रदेश में कांग्रेस के लिए बोलते हुए लोगों की आवाज में विश्वास लग रहा है कि कांग्रेस आ रही है. लेकिन शिवराज सिंह इस विश्वास के बीच में एक रोड़ा लग रहे है. राज्य में घूमने के बाद एक बात समझ में आती है कि मध्य प्रदेश बीजेपी शासित राज्यों में पहला राज्य है जहां पार्टी मोदी के नाम पर नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के नाम पर आश्रित दिख रही है. मोदी लोगों के बीच मेँ एक बड़ा नाम दिखे हर तरफ लेकिन मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह बडा़ कारण दिखे.

छिंदवाड़ा के पहाड़ी इलाकों में घूम रहा था. न्यूटन थाना पार किया और फिर पहाड़ों के अंदर लाखा पठार गांव में पहुंचा. रास्ते में सिर पर बोझा रखे हुए चार लड़कियां और महिलाएं जा रही थी. रोक कर बात चीत शुरू की. ( झिझक में थी लेकिन स्थानीय रिपोर्टर के समझाने पर वो सामान्य हुई) चार में तीन महिलाओं के घर में उज्जवला योजना के तहत गैस पहुंच चुकी है और वो उसका इस्तेमाल भी कर रही थी लेकिन जल्दी खत्म न हो इसीलिए वो लकड़ी का इस्तेमाल भी कर रही है. सरकार को लेकर उनकी समझ इतनी थी कि महिलाओं को गैस मिलने से आराम मिलता है और शौचालय बनना तो ठीक है लेकिन पानी कहां से आयेगा इस पर किसी का ध्यान नहीं है. वोट वो सिर्फ अपने घर वालों के साथ ही करेंगी किसको ये अभी उनके घरवालों ने तय नहीं किया है.

वहां से आगे की ओर चले. लाखा पठार तक जाकर सड़क खत्म हो गई है. उसके बाद 9 किलोमीटर तक पहाड़ी पत्थरों की सड़क जैसी दिखती पगडंडी पर इनोवा के टायरों के सहारे चलते रहे. और फिर एक जगह जाकर ड्राईवर प्रेम ने प्रेम से ही कह दिया कि सर अब आप पैदल ही जाएं क्योंकि वापस भी निकलना है और अंधेरा घिर रहा है. गांव तक पहुंचना था क्योंकि उस गांव में लंबे अर्से से पानी नहीं पहुंचा था. मेरे लिए ये देखना था कि छिंदवाड़ा के इस हिस्से में पानी न होने पर वो गांव कैसे चलता है.

खैर पैदल चलते हुए सीधे गांव में पहुंचे. गांव में जिस चीज ने पहला ध्यान खींचा था वो था शौचालय. हर घर के बाहर शौचालय दिख रहा है. सरकार का बना हुआ शौचालय. गांव में बिजली का तार तो दिख रहा था बिजली थी या नहीं इसका पता नहीं. घर के बाहर बैठी हुई महिलाएं दिखी. पुरुष मजदूरी के लिए शहर में गएं हुए थे और रोज हमारी तरह से गाड़ी से चल कर घऱ नहीं आ सकते इसीलिए कई कई दिन में वापस आते थे. लोगो को दिखा दो तीन पुरुष और महिलाएं को इकट्ठा किया और उनसे बात करनी शुरू कर दी. उनके मुंह से कड़वाहट से भरी हुई भाषा थी वो इस बात को समझ नहीं रही थी कि सरकार ने शौचालय बनवा दिया लेकिन पानी तो चाहिए. शौचालय तो दूर की बात यहां तो पीने के लिए पानी नहीं है गांव से तीन किलोमीटर तक बहुत ही उबड़खाबड़ पहाड़ी रास्ते चल कर झिरी में से पानी लाते है.

नदी में पेड़ के तने को काट कर बनाई गई झिरी ही पानी का स्रोत्र है. गांव में मजदूरी चिंता नहीं है लेकिन पानी वाकई नहीं है. ऐसे में जैसे ही सरकार को पूछा तो गालियों की बौछार के साथ शब्दों की वापसी हुई. लेकिन जैसे ही योजनाओं के बारे में पूछा तो पता चला कि इस गांव में दर्जनो महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस मिल चुकी है और बाकि का नाम लिखा गया है. वोट को पूछा तो सब महिलाओं के चेहरे में मुस्कान उभरी और कहा कि उसी को जो पानी देगा. और शिवराज का नाम लेते ही महिलाओं ने कहा कि वो काम तो कर रहा है लेकिन पानी की कमी है सड़क तो बन रही है और बाकि सब भी आ जाएंगा. इंदौर में घूमते हुए लोगों से बात करना मतलब सरकार की तारीफों के पुल सुनना है. काम किया है. काफी काम हुआ है जैसी बातें आपको शहरों में सुनने को मिलेगी. बालाघाट के लांजी इलाके में घूमते है तो किसानों को भावांतर के मुद्दे पर उलझते हुए देखा.

पूरे प्रदेश में राजनीति स्थानीय मुद्दों पर घूम रही है. लगा कि दिल्ली से सोची हुई एंटी इंकम्बंसी की लहर जमीन पर तो दिख नही रही है. लोग प्रधानमंत्री को इतना याद नहीं कर रहे है जितना उनको शिवराज याद आ रहे है. शहरों और गांव दोनों जगहों में शिवराज है और मोदी शहरों में अपनी पार्टी की मदद कर पा रहे है. लेकिन गांवों में कांग्रेस की ताकत को शिवराज का काम काफी हद कर रोक पाने में कामयाब दिख रहा है. रीवा से लेकर नीमच तक घूमते, जबलपुर से लेकर उज्जैन तक आपको हर तरफ स्थानीय मुद्दे हावी होते हुए दिखते है और ऐसा कोई एक मुद्दा नहीं दिख रहा है जो इस बात की ओर इशारा करे कि यहां कोई एक बड़ी लहर सरकार के खिलाफ खुले तौर पर दिख रही हो. शिवराज को अपने काम के अलावा कांग्रेस के ऐसे लोकप्रिय चेहरे की कमी का फायदा भी मिलता दिख रहा है जो कमल और ज्योति के बीच में कोई पुल बांध सके.

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