होली पर निकलती है सेठ नाथूराम की बारात, ऐसी है 190 साल पुरानी परंपरा

होली का त्योहार खुशियों और मस्ती का त्योहार है। इस दिन देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरीके से लोग अपनी परंपरा के साथ होली मनाते हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सदर बाजार में देखने को मिलती है। इसे कहते हैं ‘सेठ नाथूराम” की पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जाती है।

190 साल से यह परंपरा निभाई जा रही है। होली के पांच दिन पहले सेठ नाथूराम की बारात धूमधाम से निकाली जाती है। प्रतिमा को नाहटा बाजार के बीच स्थापित किया जाता है। पांच दिनों तक प्रतिदिन पूजा करके राजस्थानी फाग गीत गाए जाते हैं।\

होलिका दहन वाले दिन शाम को होने वाले रिसेप्शन (राजस्थानी भाषा में गोठ) में सैकड़ों बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, बच्चे रिसेप्शन में प्रसादी ग्रहण करने आते हैं। अंतिम दिन धूमधाम से होली खेलने के बाद पूजा-अर्चना करके पट बंद कर दिए जाते हैं।

महादेव अवतारी ‘इलोजी” के नाम से मशहूर

सेठ नाथूराम की पूजा में पांच पीढ़ी से सेवा कर रहे ओमप्रकाश सेवग (ओम बाबा) बताते हैं कि उनके दादा-परदादा भी सेठ नाथूराम की सेवा में पांच दिनों तक जुटे रहते थे। वे स्वयं लगभग 45 साल से लगातार बारात में शामिल होने से लेकर होली के दिन बिदाई देने तक का लुत्फ उठा रहे हैं। बचपन में दादा ने बताया था कि सेठ नाथूराम को भगवान महादेव का अवतार माना जाता है। राजस्थान के बीकानेर इलाके में उन्हें ‘इलोजी” के रूप में पूजा जाता है।

एकादशी के दिन निकलती है बारात

होली के पांच दिन पूर्व एकादशी तिथि की शाम को सत्तीबाजार से सेठ नाथूराम की बारात गाजे-बाजे के साथ निकाली जाती है। परदादा, दादा, पिता के बाद अब चौथी पीढ़ी के सेवादार रघुनाथ शर्मा बताते हैं कि कुछ सालों पहले तक सत्तीबाजार से लेकर सदरबाजार तक चार जगहों पर बारात का भव्य स्वागत होता था। पीतल से बने बड़े-बड़े पिचकारों से बारातियों पर रंग बरसाया जाता था। अब वैसे पिचकारे बाजार में मिलना ही बंद हो गए हैं। हां, जगह-जगह ठंडाई, आइस्क्रीम, कुल्फी, नाश्ता से बारातियों का स्वागत अब भी उत्साह से किया जाता है।

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